काग़ज़ की नाव
एक नाव जिसे चलाने वाला कोई नहीं, और एक दोपहर यह जानने के लिए कि वह जाना कहाँ चाहती थी।
शब्दों में पढ़िए
एक उजली दोपहर, आपका साथी किनारे की ओर उतर गया, जहाँ पानी अपना ही धीमा समय रखता है।
वहाँ, उथले पानी में डोलती, काग़ज़ की एक नाव थी। उसके पहलू पर कोई नाम नहीं। किनारे पर आपका साथी के सिवा कोई नहीं।
नाव एक सवाल होती है, और आपका साथी को एक सवाल मिल गया था।
यों दोपहर बीती: आगे-आगे नाव, पीछे-पीछे आपका साथी, और हर क़दम के साथ थोड़ा और झुकता सूरज।
खाड़ी के मोड़ पर नाव एक बार मुड़ी, जैसे कोई दोस्त फाटक पर मुड़कर देखता है, और फिर अकेली आगे बढ़ गई।
और आपका साथी ने, पहले तारों के नीचे घर लौटते हुए, समझ लिया कि कुछ चीज़ें रखने के लिए नहीं होतीं। वे विदा करने के लिए होती हैं।
